त्याग देना किसको चाहिए और माँगा किससे जा रहा है। यह चिंता का विषय है।
- Bureau ApnaSamachar
- May 13
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भारत के घरों में लगभग 27,000 टन सोना पड़ा है। इसकी अनुमानित कीमत करीब 170 लाख करोड़ रुपये से भी अधिक बैठती है। दुनिया के कई देशों की पूरी अर्थव्यवस्था इतनी नहीं जितना सोना भारतीय परिवारों के पास सुरक्षित है।
भारतीय महिलाओं के पास दुनिया का लगभग 11% सोना है। गांव में किसान संकट आने पर बैंक नहीं दौड़ता, पहले गहना गिरवी रखता है।मध्यम वर्ग मुश्किल में FD नहीं तोड़ता, पहले सोना बेचता है।यह भारत की सामाजिक सुरक्षा प्रणाली है, कोई फैशन शो नहीं।
अब सरकार कह रही है सोना मत खरीदो क्योंकि डॉलर बाहर जाता है। ठीक है, लेकिन फिर यह भी बताइए कि -
भारत 2024-25 में लगभग 62 अरब डॉलर का सोना आयात कर रहा था जबकि सिर्फ कच्चे तेल के आयात पर 242 अरब डॉलर खर्च हुए। यानी तेल पर सोने से लगभग चार गुना ज्यादा विदेशी मुद्रा खर्च हो रही है।
फिर भाषण सोने पर क्यों और पेट्रोल टैक्स पर चुप्पी क्यों? 2014 में भारत लगभग 77 प्रतिशत तेल आयात करता था, आज यह निर्भरता 85 प्रतिशत तक पहुंच गई। मतलब 11 साल में आत्मनिर्भरता बढ़ने के बजाय भारत और ज्यादा विदेशी तेल पर निर्भर हो गया।
2014 में कहा गया था रुपया मजबूत होगा, आज डॉलर 95 रुपये के पार घूम रहा है। कहा गया था भारत विश्वगुरु बनेगा, लेकिन अब जनता को कहा जा रहा है कि विदेश मत जाओ क्योंकि डॉलर खर्च होता है।
खुद 2014 से 2025 के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राओं, चार्टर्ड विमानों, एयर इंडिया वन, सुरक्षा और सरकारी इंतजामों पर 2300 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च हो चुके हैं।
सिर्फ एयर इंडिया वन विमान खरीदने में लगभग 8400 करोड़ रुपये खर्च हुए। SPG सुरक्षा का सालाना बजट 600 करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच चुका है। प्रधानमंत्री कार्यालय का सालाना बजट 700 करोड़ रुपये से ज्यादा है।
भारत के 788 सांसदों की सैलरी, भत्ते, बंगले, मुफ्त बिजली, पानी, फोन, इंटरनेट, मेडिकल, हवाई यात्रा, रेलवे यात्रा और स्टाफ सुविधाओं पर हर साल लगभग 1500 से 2000 करोड़ रुपये तक खर्च हो जाते हैं।
मंत्रियों के बंगले लुटियंस दिल्ली में हैं जहां एक-एक बंगले का रखरखाव करोड़ों में जाता है। VIP सुरक्षा पर हर साल लगभग 2000 करोड़ रुपये खर्च होते हैं। सिर्फ संसद भवन के संचालन पर ही सालाना 1000 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च बैठता है।
लेकिन त्याग कौन करेगा? जनता। मंत्री नहीं कहेंगे कि अपना काफिला छोटा करो। सांसद नहीं कहेंगे कि मुफ्त सुविधाएं छोड़ो। VIP नहीं कहेंगे कि विदेशी दौरे कम करो। सरकार नहीं कहेगी कि पेट्रोल-डीजल पर टैक्स कम करो।
जनता शादी में दो गहने खरीद ले तो अर्थव्यवस्था खतरे में पड़ जाती है, लेकिन नेताओं के 20 गाड़ियों वाले काफिले राष्ट्रहित कहलाते हैं। जनता स्कूटर चलाए तो विदेशी मुद्रा संकट, लेकिन मंत्री BMW और फॉर्च्यूनर के काफिलों में निकलें तो विकास
RBI खुद लगातार सोना खरीद रहा है। 2024 और 2025 में भारतीय रिजर्व बैंक ने दर्जनों टन सोना अपने रिजर्व में जोड़ा क्योंकि दुनिया के केंद्रीय बैंक डॉलर पर भरोसा कम कर रहे हैं। मतलब सरकार के लिए सोना सुरक्षित निवेश है लेकिन जनता के लिए “देशहित के खिलाफ खर्च।”
अगर अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत है जितनी टीवी पर दिखाई जाती है तो फिर जनता को “कम खरीदो कम घूमो कम खाओ” वाला ज्ञान क्यों दिया जा रहा है?
मजबूत अर्थव्यवस्था जनता की जेब मजबूत करती है, कमजोर अर्थव्यवस्था जनता को त्याग सिखाती है।
आज हालत यह है कि देश का युवा बेरोजगारी में फंसा है, मध्यम वर्ग EMI में दबा है, किसान लागत में टूट रहा है, कमर्शियल गैस सिलेंडर 3000 रुपये तक पहुंच चुका है, पेट्रोल-डीजल पर भारी टैक्स है, लेकिन सत्ता की ऐशोआराम वाली मशीन में कोई कटौती नहीं।
कल को शायद नया आर्थिक मॉडल आएगा जिसमें पैदल चलना राष्ट्रवाद कहलाएगा, आधा पेट खाना आत्मनिर्भरता कहलाएगा और जनता का त्याग ही सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि घोषित कर दिया जाएगा।




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